Monday, 31 December 2018

Tulsidas Poems in Hindi-तुलसीदास की dohe

Tulsidas Poems in Hindi-तुलसीदास की dohe
Tulsidas Poems in Hindi-तुलसीदास की dohe
Tulsidas Poems in Hindi-तुलसीदास की dohe आज हम आपको बताने वाले हैं आपने सायद तुलसीदास के बहुत से दोहे सुने होंगे उन्ही दोहों में से आज आपके लिए यहाँ पर कुछ दोहे लेकर आ रहा हूँ जिन्हे आप यहाँ देख सकते हैं और उन्हें पढ़ सकते हैं और आप यहाँ से तुलसीदास के दोहे अर्थ सहित pdf भी देख सकते हैं और डाउनलोड भी कर सकते हैं तो शुरू करता हूँ दोस्तों उम्मीद करता हूँ आपको tulsidas poem in hindi
पसंद आएगी।
tulsidas poem in hindi
तुलसीदास के भक्ति पद
सासति करि पुनि करहि पसाउ।नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाउ।
अच्छे स्वामी का यह सहज स्वभाव है कि वे पहले दण्ड देकर फिर दया करते हैं।
.जिन्ह हरि कथा सुनी नहि काना।श्रवण रंध्र अहि भवन समाना।
जिसने अपने कानों से प्रभु की कथा नही सुनी उसके कानों के छेद साॅप के बिल के समान हैं।
कुलिस कठोर निठुर सोई छाती।सुनि हरि चरित न जो हरसाती।
उसका हृदय बज्र की तरह कठोर और निश्ठुर है जो ईश्वर का चरित्र सुनकर प्रसन्न हर्शित नही होता हैं। 
तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय
जन गुन गाहक राम दोस दलन करूनायतन।
प्रभु पूर्णकाम सज्जनों के शिरोमणि और प्रेम के प्यारे हैं।
प्रभु भक्तों के गुणग्राहक बुराईयों का नाश करने बाले और दया के धाम हैं।
नयन विशय मो कहुॅ भयउ सो समस्त सुख मूल
सबइ लाभु जग जीव कहॅ भएॅ ईसु अनुकूल।
प्रभु हमारी आखों के लिये सम्पूर्ण सुखों के मूल हैं 
तथा प्रभु के अनुकूल होने पर संसार में जीव को सब लाभ प्राप्त होता है।
काम कोह मद मान न मोहा।लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।
जिन्ह के कपट दंभ नहि माया। तिन्ह के हृदय बसहु रघुराया।
जिनको काम वासना क्रोध घमंड अभिमान और मोह नहीं है और न हीं राग द्वेश छल कपट घमंड या माया लेशमात्र भी नही है
भगवान उसी के हृदय में निवास करते हैं।
जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पाबई
ज्ञान गुण और इन्द्रियों से परे जप योग और समस्त धर्मों से मनुश्य अनुपम भक्ति पाता है .
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम
तिन्ह के हृदय कमल महुॅ करउॅ सदा विश्राम।
जिन्हें बचन मन और कर्म से सर्वदा ईश्वर में घ्यान रहता है तथा जो विना किसी इच्छा के उनका भजन करते हैं -ईश्वर सर्वदा उनके हृदय कमल के बीच विश्राम करते हैं।
जे ब्रह्म अजम द्वैतमनु भवगम्य मन पर ध्यावहीं।
ब्रह्म अजन्मा एवं अद्वैत है।वह केवल अनुभव से जाना जाता है।वह मन से परे है।


सोइ सर्वग्य तग्य सोइ पंडित।सोइ गुन गृह विज्ञान अखंडित।
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई।जाकें पद सरोज रति होई।
वह सर्वग्य तत्वज्ञ एवं पंडित है।वह गुणों का घर एवं अखंड ज्ञानी विद्वान है।
वह चतुर और सभी अच्छे गुणों से युक्त है जिसे प्रभु के चरणों में प्रेम है।
कमठ पीठ जामहिं बरू बारा।बंध्यासुत बरू काहुहिं मारा।
फूलहिं नभ बरू बहु बिधि फूला।जीवन लह सुख हरि प्रतिकूला।
कछुआ की पीठ पर बाल उग सकता है।बाॅझ का बेटा भले किसी को मार दे।
आकाश में अनेक किस्म के फूल खिल जायें लेकिन प्रभु से विमुख जीव सुख नही पा सकता है।
 तुलसीदास की कविता in hindi
Tulsidas Poem 1
रि! तुम बहुत अनुग्रह किन्हों।
साधन-नाम बिबुध दुरलभ तनु, मोहि कृपा करि दीन्हों॥१॥

कोटिहुँ मुख कहि जात न प्रभुके, एक एक उपकार।
तदपि नाथ कछु और माँगिहौं, दीजै परम उदार॥२॥

बिषय-बारि मन-मीन भिन्न नहिं होत कबहुँ पल एक।
ताते सहौं बिपति अति दारुन, जनमत जोनि अनेक॥३॥

कृपा डोरि बनसी पद अंकुस, परम प्रेम-मृदु चारो।
एहि बिधि बेगि हरहु मेरो दुख कौतुक राम तिहारो॥४॥

हैं स्त्रुति बिदित उपाय सकल सुर, केहि केहि दीन निहोरै।
तुलसीदास यहि जीव मोह रजु, जोइ बाँध्यो सोइ छोरै॥५॥
Tulsidas Poem 2
हाराज रामादर्यो धन्य सोई।
गरूअ, गुनरासि, सरबग्य, सुकृती, सूर, सील,-निधि, साधु तेहि सम न कोई।1।

उपल ,केवट, कीस,भालु, निसिचर, सबरि, गीध सम-दम -दया -दान -हीने।।
नाम लिये राम किये पवन पावन सकल, नर तरत तिनके गुनगान कीने।2।

ब्याध अपराध की सधि राखी कहा, पिंगलै कौन मति भगति भेई।
कौन धौं सेमजाजी अजामिल अधम, कौन गजराज धौं बाजपेयी।3।

पांडु-सुत, गोपिका, बिदुर, कुबरी, सबरि, सुद्ध किये, सुद्धता लेस कैसो।
प्रेम लखि कृस्न किये आने तिनहूको, सुजस संसार हरिहर को जैसो।4।

कोल, खस, भील जवनादि खल राम कहि, नीच ह्वै ऊँच पद को न पायो।
दीन-दुख- दवन श्रीवन करूना-भवन, पतित-पावन विरद बेद गायो।5।

मंदमति, कुटिल , खल -तिलक तुलसी सरिस, भेा न तिहुँ लोक तिहुँ काल कोऊ।

नाकी कानि पहिचानि पन आवनो, ग्रसित कलि-ब्याल राख्यो सरन सोऊ।6।
Tulsidas Poem 3
है नीको मेरो देवता कोसलपति राम।
सुभग सरारूह लोचन, सुठि सुंदर स्याम।1।

सिय-समेत सोहत सदा छबि अमित अनंग।
भुज बिसाल सर धनु धरे, कटि चारू निषंग।2।

बलिपूजा चाहत नहीं , चाहत एक प्रीति।
सुमिरत ही मानै भलो, पावन सब रीति।3।

देहि सकल सुख, दुख दहै, आरत-जन -बंधु।
गुन गहि, अघ-औगुन हरै, अस करूनासिंधु।4।

देस-काल -पूरन सदा बद बेद पुरान।
सबको प्रभु, सबमें बसै, सबकी गति जान।5।

को करि कोटिक कामना , पूजै बहु देव।

तुलसिदास तेहि सेइये, संकर जेहि सेव।6।
Tulsidas Poem 4

वधेस के द्वारे सकारे गई सुत गोद में भूपति लै निकसे।
अवलोकि हौं सोच बिमोचन को ठगि-सी रही, जे न ठगे धिक-से॥
‘तुलसी’ मन-रंजन रंजित-अंजन नैन सुखंजन जातक-से।
सजनी ससि में समसील उभै नवनील सरोरुह-से बिकसे॥

तन की दुति श्याम सरोरुह लोचन कंज की मंजुलताई हरैं।
अति सुंदर सोहत धूरि भरे छबि भूरि अनंग की दूरि धरैं॥
दमकैं दँतियाँ दुति दामिनि ज्यों किलकैं कल बाल बिनोद करैं।
अवधेस के बालक चारि सदा ‘तुलसी’ मन मंदिर में बिहरैं॥

सीस जटा, उर बाहु बिसाल, बिलोचन लाल, तिरीछी सी भौंहैं।
तून सरासन-बान धरें तुलसी बन मारग में सुठि सोहैं॥
सादर बारहिं बार सुभायँ, चितै तुम्ह त्यों हमरो मनु मोहैं।
पूँछति ग्राम बधु सिय सों, कहो साँवरे-से सखि रावरे को हैं॥

सुनि सुंदर बैन सुधारस-साने, सयानी हैं जानकी जानी भली।
तिरछै करि नैन, दे सैन, तिन्हैं, समुझाइ कछु मुसुकाइ चली॥
‘तुलसी’ तेहि औसर सोहैं सबै, अवलोकति लोचन लाहू अली।
अनुराग तड़ाग में भानु उदै, बिगसीं मनो मंजुल कंजकली॥

बलिपूजा चाहत नहीं , चाहत एक प्रीति।
सुमिरत ही मानै भलो, पावन सब रीति।3।

देहि सकल सुख, दुख दहै, आरत-जन -बंधु।
गुन गहि, अघ-औगुन हरै, अस करूनासिंधु।4।

देस-काल -पूरन सदा बद बेद पुरान।
सबको प्रभु, सबमें बसै, सबकी गति जान।5।

को करि कोटिक कामना , पूजै बहु देव।

तुलसिदास तेहि सेइये, संकर जेहि सेव।6।
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ABHI

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